मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

महंगाई, एफडीआई और लड़ाई

सुधीर कुमार  

इस शीत सत्र में गांव से लेकर संसद तक गर्म हवाएं चल रही हैं। ये हवाएं किसी को झुलसा रही हैं, तो किसी को गुनगुना कर रही हैं। सरकार ने एफडीआई का नया भूत छोड़ दिया है। यह किसको खाएगा और किसे पालेगा, यह गंभीर पहलू है। इस सत्र में इसने संसद पर पूरे के पूरे नौ दिन अपना साया बनाए रखा। जबकि महंगाई, गरीबी, कुपोषण, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और घोटालों से व्यथित जनता सरकार और संसद की ओर ताक रही है कि कोई खिड़की खुले। देश निर्णायक मोड़ पर है, संसद चल नहीं रही है। सत्ता और विपक्ष दोनों को शह-मात के खेल में चूर हैं।
राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र में तनाव है। जनमानस का दबाव है। थोड़ा से असंतुलन हुआ, ‘गाड़ी’ पटरी से उतर सकती है। सरकार तो दूर, नौकरशाही भी जल्दी में कोई फैसला नहीं ले रही है। वह फैसला लेने में हिचकिचा रही है। क्योंकि कुछ करने में कहीं कोई गलती नहीं कर जाएं। बात यह है कि कुछ नहीं करने में कम से कम इतना तो भरोसा है कि आप कुछ गलत नहीं कर रहे हैं। पिछले दो-तीन साल से जब से भ्रष्टाचार की परतें-दर-परतें उघड़ती गईं तब से यही हाल है। राष्ट्रमंडल से शुरू होकर टूजी स्पेक्ट्रम की बिक्री तक जो कुछ भी हुआ, उसने समूचे भारतीय परिदृश्य में विष-सा घोल दिया है। आज इसको लेकर जनमानस में बौखलाहट है, क्रोध है। यह स्थिति कोई अचानक आन नहीं खड़ी हुई है। कुछ भी हो, इन और ऐसी घटनाओं ने संदिग्ध व्यक्तियों का पहचानने का एक रास्ता अख्तियार किया है। अब हाल यह है कि राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र में हरेक-दूसरे व्यक्ति को संदेह की नजर से देखा जा रहा है। भष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के आंदोलन ने इस संदेहास्पद स्थिति को और बल दिया है।
‘लचर सरकार’ की छवि से दो-चार हो रही केंद्र की यूपीए सरकार ने अब इधर खुदरा कारोबारियों से बैर ले लिया है। 24 नवंबर को नई दिल्ली में केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में खुदरा (रिटेल) कारोबार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी दी है। इसके बाद से बहु (मल्टी) ब्रांड रिटेल में 51 प्रतिशत विदेशी निवेश किया जा सकेगा। साथ ही एकल ब्रांड (सिंगल ब्रांड) में विदेशी निवेश की सीमा खत्म कर इसे सौ प्रतिशत कर दिया गया है। खुदरा बाजार में प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश लाने के पीछे सरकार की दलील है कि वॉलमार्ट और टेस्को जैसी कंपनियों के आने से उपभोक्ताओं को एक ही छत के नीचे, कम दाम पर बेहतर सामान मिल सकेगा। लेकिन सरकार यह भूल गई कि उन छोटे किराना व्यापारियों का क्या होगा, जिनके परिवार का खर्च उनकी उसी छोटी दुकान से चलता है। एक से ज्यादा ब्रांड की श्रेणी में दस करोड़ डॉलर के न्यूनतम निवेश का नियम सरकारी मंजूरी में रखा गया है। लेकिन, जब विदेशी वॉलमार्ट और टेस्को जैसी बड़ी कंपनियां बड़ी पूंजी भारतीय बाजार में लगाएगी, तो जाहिर है वह अपने फायदे के लिए ही करेगी। उसे यहां के बाजार और आमजन से कोई सीधा सरोकार नहीं रहेगा। सरकार कितनी ही दलीलें दे और भले ही हालिया दुष्परिणाम इससे देखने को नहीं मिलें, लेकिन असर दूरगामी जरूर होंगे।
अब इससे पैदा होने वाली समस्याओं पर नजर डालें। किराना कारोबार में इस फैसले से दो समस्याएं पैदा होंगी। एक तो सीधा असर घरेलू खुदरा व्यापार पर पड़ेगा। यह कारोबार लड़खड़ाएगा। लघु उद्योग अछूते नहीं रहेंगे। भारतीय कंपनियों के पास इतनी पूंजी नहीं है कि सस्ते और टिकाऊ उत्पाद तैयार कर सकें। अगर ऐसा करते भी हैं तो बहुत दिनों तक वह घाटा नहीं उठा पाएंगे। इसके इतर वॉलमार्ट और टेस्को जैसी कंपनियों के पास पूंजी कमी जैसी कोई समस्या नहीं है। अकेले वॉलमार्ट अपने में बड़ी पूंजी संग्रह है और दुनिया भर के 16 से अधिक देशों में कारोबार फैलाए है।
देश का खुदरा बाजार भारतीय अर्थव्यस्था की रीढ़ है। देश के 90 प्रतिशत से अधिक लोगों का हित खुदरा कारोबार से जुड़ा है। देश का खुदरा व्यापारी अपनी छोटी पूंजी से ही कारोबार करता है। इसके बाद अब उसे एकदम बड़े पूंजी निवेश से मुकाबला करना होगा। अगर वह कर्ज लेकर मुकाबला करने की कोशिश भी करता है तो इसमें कोई गारंटी नहीं है कि वह उपभोक्ताओं को अपनी ओर खींच सके। ऐसा कितने साल तक वह कर सकेगा, यह कोई निश्चिय नहीं। ऐसे में बहुत अधिक आशंका रहेगी कि वह या तो सरेंडर कर देगा या फिर रास्ते से हट जाएगा। और यही से खुदरा कारोबार के पतन का रास्ता शुरू होता है।
फिलहाल, रिटेल स्टोर बड़े शहरों में खोले जाएंगे। ऐसे शहरों में जिनकी आबादी दस लाख या इससे अधिक है। यह सही है कि अभी तुरंत यह गांवों और कस्बों के खुदरा कारोबार को असर नहीं डाले, लेकिन आने वाले वर्षों में वह भी कतई इससे अछूते नहीं रहेंगे। यह नव उदारवादी नीतियों का ही एक पहलू है। एक ऐसी हवा, जिसमें किसानों, आदिवासियों, कमजोरों के लिए कोई जगह नहीं है। दुनिया पर एक सरसरी निगाह ही दौड़ाएं तो मालूम पड़ेगा कि हालात अच्छे नहीं हैं। अमेरिका सहित यूरोप में कई बड़े आंदोलन चल रहे हैं। अमेरिका में पूंजीवादी व्यवस्था का जिस तरीके से विरोध हो रहा है और इस विश्वशक्ति को कंगाली की हालत पर पहुंचा दिया है, वह सोचने को मजबूर करता है। यही कारण और भी देशों में है, जहां इस तरह के आंदोलन हो रहे हैं। भारत इससे कतई अछूता नहीं है। जिस मंशा से यहां के फुटकर कारोबार में उसी नव पूंजीवादी व्यवस्था को जगह दी जा रही है, जिसका दुनिया भर में विरोध हो रहा है। भारत में भी इसे आम जनमानस के लिए सुदृढ़ आर्थिक पुल होने का दिलासा दिलाया जा रहा है। वाकई में ऐसा कुछ नहीं है। नब्बे फीसदी से अधिक परिवारों का पोषण करने वाले खुदरा कारोबार को सींचने चली (सरकार के मुताबिक) सरकार की इस नदी (रिटेल में एफडीआई) के एक ओर पूंजीवाद व्यवस्था खड़ी होगी तो दूसरी किसान और खुदरा कारोबारी। इसमें दो राय नहीं है कि यह नदी अपना कटान किसान और खुदरा कारोबारियों की ओर ही करेगी और जब ये इसमें डूबेंगे तबतक उनमें इतना दम नहीं रहेगा कि सुरक्षित तैर सकें।
अब बात आती है बिचौलियों (आढ़तियों) की। कोई भी बड़े शहरों में किसानों से खरीदकर बाजार में आपूर्ति करने वाले बिचौलिए शहर से सौ किलोमीटर से अधिक दूर जाने को राजी नहीं होते। ऐसे में कहा नहीं जा सकता कि आपूर्तिकर्ता दूर गांवों तक जाएंगे और अधिक मूल्य में उनसे किसानों से माल (उत्पाद) खरीदेंगे। हां, इतना जरूर है कि दूर गांवों में किसानों से भाड़े का रोना रोकर कम से कम कीमत में माल खरीदने की कोशिश रहती है बिचौलियों की। किसानों को शुरू में अधिक कीमत मिलेंगी, बाद में वे विदेशी कंपनियों की दया पर जीने को मजबूर होंगे। हमारी जो सालोंसाल से चली आ रही पुरानी आपूर्ति श्रंखला जब टूटेगी तो तय है कि वैश्विक कंपनियों का एकाधिकार बढ़ेगा। लोगों को रोजगार तो मिलेगा, पर इसके मुकाबले कहीं अधिक लोगों को बेरोजगारी का श्राप झेलना पड़ेगा। रहीं बात कीमतों के बारे में, तो शुरू में कीमतें घटेंगी, लेकिन एक बार विदेशी कंपनियों का पांव जमने के बाद कीमत बढ़ना कोई बड़ी बात नहीं है।
ताज्जुब होता है कि समस्याओं के निदान की बात तो दूर हम देश में समस्याएं पैदा भी नहीं कर सकते, इसके लिए भी विदेश की ओर मुंह ताकते हैं। मानव सभ्यता के विकास के साथ ही सामाजिक जीवन में मदद की परंपरा शुरू हो गई थी। भारत का खुदरा बाजार आज भी इसकी मिसाल है। पास की किराना दुकान से महीने भर राशन लेने के बाद आज भी तनख्वाह मिलने के बाद चुकता किया जाता है। यही सुदृढ़ सामाजिक ताने-बाने का नतीजा है कि हमारे एक-दूसरे से हित जुड़े रहते हैं। यह सब वालमार्ट और टेस्को या फिर केयरफोर कंपनियों की दुकानों में नहीं मिलेगा। अमेरिका का अनुभव रहा है कि वॉटमार्ट जहां भी अपना स्टोर खोलती है तो उसकी अस्सी प्रतिशत से अधिक आय आसपास के छोटे व्यापारियों का धंधा हड़पकर ही होती है। सवाल यह भी है कि जब महंगाई का जहर गाढ़ा हो रहा हो और देश के सामने और भी गंभीर समस्याएं हों तो ऐसे समय सरकार द्वारा लिया गया यह फैसला क्या समझदारी भरा है। हर बार अनाज की कमी का रोना रोया जाता है, जबकि अपना अनाज गोदामों में सड़ा दिया जाता है। आखिर यह सब क्यों?  सरकार अपनी वितरण व्यवस्था क्यों नहीं दुरुस्त कर लेती। इसके लिए हम क्यों विदेशी कंपनियों की ओर मुंह ताकते हैं। दोषपूर्ण वितरण व्यवस्था के लिए आखिर दोषी है कौन? अगर विदेशी कंपनियां यहां आकर कितना सही कर भी देती हैं तो भी हमारी सरकार के लिए यह यक्ष प्रश्न है। आखिर, हमारी सरकार इतनी असहाय क्यों है? यह आमजन का सवाल है और समय की मांग भी।
जानना जरूरी है कि आखिर में हम किस ओर जा रहे हैं? वैश्वीकरण-उदारीकरण-कंपनीकरण की जो हवाएं प्रवाह की गई हैं, वह देश और आमजन को किस ओर ले जाएंगी? वह कौन सा रास्ता बनाएंगी गुजरने के लिए? इसका अगला पड़ाव क्या होगा?  क्या वही तो नहीं, जोकि अमेरिका और यूरोप में हो रहा है? ...और अगर ये हवाएं हमें उस ओर ही ले जाने के लिए विवश कर रही हैं तो फिर देश और हम सबके लिए यह अच्छे संकेत नहीं हैं।

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शनिवार, 20 अगस्त 2011

गहरी हैं जड़ें


सुधीर कुमार
चपरासी से लेकर अफसर और संतरी से लेकर मंत्री तक भ्रष्टाचार के आकंठ में डूबा है। किसी न किसी रूप में हर आदमी भ्रष्टाचार और भ्रष्ट तंत्र से पीड़ित है। साथ ही वह इस 'अंग' का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हिस्सा भी है। वर्तमान में भारत इस विकराल समस्या से जूझ रहा है। राजनीतिक-प्रशासनिक क्षेत्र पर कब्जा जमाकर भ्रष्टाचार अब सामाजिक क्षेत्र में भी जड़ें पसार चुका है। यहां तक कि आदमी की जीवनशैली में शुमार हो गया है भ्रष्टाचार। अब हमें यह चौंकता नहीं। रिश्वत लेते या देते समय आदमी को अब लज्जा नहीं आती।
दरअसल, यह हालात कोई एक-दो दिन या कुछ सालों में पैदा नहीं हुए हैं। यह सदियों पुरानी सत्ताधारियों की पथभ्रष्ट बेहूदा राजनीति के दुष्चक्र का प्रभाव है। आज भारत में भ्रष्टाचार चरम पर है। ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है, जिसमें यह घर नहीं कर गया हो। अब यहां एक बात गौर करने लायक है कि किसी भी समाज या देश की रीढ़ उसकी आथिक सुदृढ़ता होती है। और ऐसे में पूरी संभावना रहती है कि आदमी अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए कोई (!) भी तौरतरीका अपनाने से गुरेज नहीं करना चाहेगा। दूसरी बात यह कि हमेशा से ही भ्रष्टचार का संबंध राजनीति, प्रशासन, सत्ता और साथ ही व्यापार से रहा है। समाज के परिपक्व होने के साथ-साथ इनका रिश्ता कमजोर नहीं, वरन और भी अधिक प्रगाढ़ होता गया है।
शुरुआत की बात पर फिर लौटते हैं। भ्रष्टाचार आज इस कदर पसर चुका है कि यह जीवन में उतना ही जरूरी महसूस किया जाना लगा है कि जितना कि आक्सीजन। नजर पसारें तो अस्पताल, थाना, बैंक, स्कूल, कालेज, नौकरी, सरकारी दफ्तर, राशन की दुकान, परिवहन आखिर कहां नहीं है भ्रष्टाचार। अस्पताल में करीबी को भर्ती कराना हो तो रिश्वत, ड्राइविंग लाइसेंस बनवानी हो तो रिश्वत, बर्थ सर्टिफिकेट बनावाना हो तो रिश्वत, मृत्यु प्रमाणपत्र के लिए रिश्वत, बिजली-पानी कनेक्शन कराना है तो रिश्वत, घर बनावाने के लिए प्लान पास करवाना हो तो रिश्वत दिए बिना फाइल आगे बढ़ेगी ही नहीं। इन सबसे हर आदमी का रोजाना वास्ता पड़ता है।
भ्रष्टाचार का यह रूप महज एक निचले स्तर का है। इस स्तर को बगैर दृढ़ इच्छाशक्ति के बूते रोक पाना कतई संभव नहीं है। लेकिन जो 'भ्रष्ट सांप' सिस्टम (तंत्र) में कुंडली मारे बैठे हैं, उनका सफाया करना इतना आसान नहीं जितना कि हम सोचते हैं। ये 'सांप' सिस्टम (प्रशासनिक और राजनीतिक) में सुनियोजित तरीके से रेंगते हैं। इसकी भनक आम आदमी को लगती तो नहीं है, बल्कि असर जरूर होता है। अब टूजी स्पेक्ट्रम मामले हो ही ले लीजिए। 1 लाख 76 करोड़ रुपये का घोटाला।  ऐसे सिस्टेमिक भ्रष्ट तंत्र को गला पाना तभी संभव है, जब दुनिया के सबसे बड़े इस लोकतंत्र की पिलपिली प्रक्रिया को दुरुस्त किया जाए। पूरे परिदृश्य को देखते हुए यह कहना कतई गुनाह नहीं होगा कि गांव में राशन दुकान से लेकर लोकसभा तक एक नया भ्रष्ट समाज (!) पैदा हो गया है।
और वैसे भी भारत अतुल्य देश है। यहां के लोग गांधीजी के तीन बंदरों में विश्वास रखते हैं। हालत यह है कि सभ्य लोग (!) उन तीन बंदरों की तरह बनकर रह गए हैं। यह हमारा मामला नहीं है और बस हमारा काम तो हो गया, की तर्ज पर आंख मूंदकर रास्ता बदल लेते हैं। तय करना होगा कि क्या वह आने वाली पीढ़ी को भ्रष्ट समाज में ही पालना चाहते हैं? दरअसल, कोई पूरी एक पीढ़ी को ही तय करना होगा कि क्या वह गांधीजी के 'तीन बंदर' की तरह बनकर रहना चाहती है? और फिर वह दूसरी आजादी (भ्रष्टाचार से लड़ने) के लिए अपनी किस पीढ़ी को कुर्बान करना चाहती है, फैसला आपके हाथ...

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